ट्रेनिंग कैडर के दो अफसर को डिप्टी कमिश्नर पद पर प्रमोशन देने का मामला, हाईकोर्ट ने खारिज की चुनौती

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने उत्तराखंड लोक सेवा अधिकरण के 23 दिसंबर 2019 के आदेश की पुष्टि की है, जिसमें प्रशिक्षण संवर्ग के दो अधिकारियों को डिप्टी कमिश्नर पद पर पदोन्नति को सही ठहराया गया था. इस आदेश को पीडीएस सेवा के अधिकारी भारत चन्द्र भट्ट और अन्य ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया.

 

न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने कहा कि 2011 के नियम लागू होने से पूर्व ग्रामीण विकास विभाग में डिप्टी कमिश्नर और समकक्ष के 8 स्वीकृत पद थे. पुराने नियमों के तहत प्रशिक्षण संवर्ग के प्रिंसिपल (ग्रुप-ए) अधिकारियों को 25 प्रतिशत कोटा प्राप्त था. इसी के आधार पर 2015 में हुई पदोन्नति में प्रतिवादी को प्रमोशन दिया गया था.

अदालत ने कहा कि नियमों में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि प्रशिक्षण संवर्ग के प्रिंसिपल (ग्रुप-ए) को प्रांतीय विकास सेवा (पीडीएस) कैडर में पदोन्नति से वंचित किया जाए. इसलिए लोक सेवा अधिकरण द्वारा दी गई राहत में कोई त्रुटि नहीं पाई गई. याचिकाकर्ताओं की यह दलील भी खारिज कर दी गई कि 2010 के पुनर्गठन आदेश केवल ब्लॉक विकास अधिकारी संवर्ग तक सीमित था.

 

याचिकाकर्ताओं ने 3 अक्टूबर 2013 के उस सरकारी आदेश को भी चुनौती दी थी, जिसमें 10 मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) के पद पीसीएस/आईएएस अधिकारियों के लिए आरक्षित किए गए थे. अदालत ने इस पहलू पर विचार करने से इनकार करते हुए कहा कि यह नीति निर्धारण का विषय है और याचिकाकर्ता चाहें तो इस आदेश को अलग से चुनौती दे सकते हैं.

इस प्रकार, हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए लोक सेवा अधिकरण के आदेश को बरकरार रखा और प्रशिक्षण संवर्ग के अधिकारियों की पदोन्नति को वैध माना. याचिकाकर्ताओं को स्वतंत्र कार्रवाई में सरकारी आदेश को चुनौती देने की छूट दी गई.

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मंगलौर हरिद्वार के एक परिवार को आरोपियों के द्वारा बार-बार जान से मारने और धमकी देने पर उनको पुलिस के द्वारा सुरक्षा नहीं दिए जाने के मामले पर सुनवाई की. मामले की सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जी नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मंगलौर थाने के एसएचओ से कहा है कि उनके प्रार्थनापत्र के आधार पर उन्हें सुरक्षा दी जाए.

 

मामले के अनुसार, मंगलौर के शमीम अहमद और उनके परिवार के सदस्यों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर कहा है कि उनको और उनके परिवार के सदस्यों को जानमाल का खतरा है. अपनी सुरक्षा के लिए उनके द्वारा मंगलौर थाने पर प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन पुलिस उन्हें सुरक्षा नहीं दे रही है. उनको बार बार आरोपी लियाकत, वसीम और जुल्लू धमकी दे रहे हैं. जबकि उनके पुत्र का हत्यारा रियासत जेल में बंद है. अब इनके द्वारा धमकी देने के कारण उनके बच्चे स्कूल तक नहीं जा पा रहे हैं. इसलिए उन्हें सुरक्षा दिलाई जाए.

हुई सुनवाई पर एसएचओ मंगलौर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए. उनके द्वारा कोर्ट को अवगत कराया कि इनके बच्चे अभी मंगलौर में नहीं हैं. वे कहीं अन्य जगह पर हैं. जब वे यहां आते हैं तो उन्हें सुरक्षा दी जाएगी. साथ ही मुकदमे में चार्जशीट दायर हो चुकी है और एक आरोपी जेल में बंद है. जिसपर कोर्ट ने उन्हें सुरक्षा देने के आदेश दिए.

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