Education news: देहरादून के विद्यालयों में आयोजित एक लेखन प्रतियोगिता ने मातृभाषा हिंदी की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस प्रतियोगिता में सामने आया कि बड़ी संख्या में छात्र हिंदी के सामान्य शब्द तक सही ढंग से नहीं लिख पा रहे हैं।
यह स्थिति केवल किसी एक स्कूल तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे जिले के कई विद्यालयों में देखने को मिली।
90% बच्चों को नहीं आती सरल हिंदी वर्तनी
प्रतियोगिता में आठवीं से ग्यारहवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों ने भाग लिया।
उनकी कॉपियों की जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि करीब 90 प्रतिशत छात्र “सरकार”, “कारण”, “उत्तराखंड”, “शहर”, “अखबार”, “निवेदन” जैसे बेहद सामान्य शब्दों की भी सही वर्तनी नहीं लिख सके।
स्थिति इतनी चिंताजनक रही कि कुछ छात्र अपना नाम तक सही ढंग से नहीं लिख पाए।
विदेशी भाषाओं के दबाव में हिंदी कमजोर
विद्यालयों में आजकल अंग्रेजी के साथ-साथ जर्मन, फ्रेंच और इटालियन जैसी विदेशी भाषाओं पर ज्यादा जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कारण हिंदी विषय को पर्याप्त महत्व नहीं मिल पा रहा है।
परिणामस्वरूप:
- बच्चों का शब्द भंडार कमजोर हो रहा है
- लेखन क्षमता घट रही है
- भाषा के प्रति आत्मविश्वास कम हो रहा है
हिंदी बोलने पर जुर्माना—गंभीर सवाल
सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि कुछ स्कूलों में हिंदी बोलने पर छात्रों से जुर्माना वसूला जा रहा है।
बच्चों के अनुसार, हिंदी बोलने पर 10 से 20 रुपये तक का फाइन लगाया जाता है।
इससे बच्चों में यह भावना विकसित हो रही है कि हिंदी बोलना गलत है, जो भाषा और संस्कृति दोनों के लिए चिंताजनक संकेत है।
विशेषज्ञों की राय: पढ़ने और लिखने की आदत जरूरी
शिक्षाविदों का मानना है कि इस स्थिति को सुधारने के लिए बच्चों में पढ़ने और लिखने की आदत विकसित करना बेहद जरूरी है।
रोज हिंदी अखबार पढ़ें
कहानी, कविता और बाल साहित्य से जुड़ें
प्रतिदिन लेखन अभ्यास करें
विद्यालयों में व्याकरण और लेखन की अतिरिक्त कक्षाएं चलें
सिर्फ बच्चे नहीं, समाज भी जिम्मेदार
इस गिरती स्थिति के लिए केवल छात्र नहीं, बल्कि अभिभावक और शिक्षक भी जिम्मेदार हैं।
- घर में हिंदी बोलने और पढ़ने का माहौल कम हो रहा है
- स्कूलों में हिंदी को प्राथमिकता नहीं दी जा रही
- अंग्रेजी बोलने को ही “स्मार्टनेस” का पैमाना माना जा रहा है
निष्कर्ष: अभी नहीं संभले तो देर हो जाएगी
हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि हमारी पहचान और संस्कृति का आधार है।
यदि अभी से इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाली पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर हो सकती है।
जरूरत है संतुलन की—जहां बच्चे आधुनिक और बहुभाषी बनें, लेकिन अपनी जड़ों से जुड़े रहें।











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