बदली बारिश, घटता हिमपात और बढ़ता खतरा: मध्य हिमालय की प्रकृति पर संकट

मध्य हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके संकेत ज़मीन पर साफ़ दिखने लगे हैं। हिमपात में लगातार कमी, बारिश के बदले स्वरूप और बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप ने इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र की जैव विविधता को गंभीर खतरे में डाल दिया है।

वैज्ञानिकों के अनुसार इन बदलावों का सीधा असर वनस्पतियों की संरचना, जल स्रोतों की निरंतरता और वन्यजीवों के प्राकृतिक व्यवहार पर पड़ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित हुआ शोध

मध्य हिमालय पर आधारित यह महत्वपूर्ण शोध हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा किया गया है, जिसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल International Journal of Biodiversity Science, Ecosystem Services & Management में प्रकाशित किया गया है।

शोध में चेतावनी दी गई है कि यदि समय रहते ठोस और वैज्ञानिक कदम नहीं उठाए गए, तो मध्य हिमालय की पारिस्थितिक स्थिरता के साथ-साथ इससे जुड़े करोड़ों लोगों की आजीविका भी संकट में पड़ सकती है।

घटता हिमपात, सूखते जलस्रोत

विशेषज्ञों के अनुसार पहले ऊंचाई वाले इलाकों में जहां लंबे समय तक पर्याप्त हिमपात होता था, अब वहां बर्फबारी कम और अनियमित हो गई है। हिमपात का देर से होना और जल्दी पिघल जाना जलधाराओं, नौलों और प्राकृतिक स्रोतों को प्रभावित कर रहा है।

कई जलस्रोत जो पहले पूरे वर्ष पानी उपलब्ध कराते थे, अब केवल बरसात के मौसम तक सीमित होते जा रहे हैं।

बारिश का बदला स्वरूप बना नई चुनौती

जलवायु परिवर्तन का असर वर्षा के पैटर्न में भी साफ दिखाई दे रहा है। कुल वर्षा में बहुत अधिक कमी न होने के बावजूद अब कम समय में अत्यधिक बारिश और लंबे सूखे दौर देखने को मिल रहे हैं।

इससे भूस्खलन, मृदा अपरदन, सड़क क्षति और फसलों के नुकसान की घटनाओं में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।

औषधीय पौधों पर मंडरा रहा संकट

मध्य हिमालय में पाए जाने वाले कई बहुमूल्य औषधीय पौधे भी जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं। शोध के अनुसार कुटकी, अतीस, जटामासी, सालम पंजा और चिरायता जैसे पौधों की संख्या और उनकी पुनर्जनन क्षमता में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है।

बदलती जलवायु के साथ-साथ अत्यधिक दोहन ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष

वन क्षेत्रों में लगातार दोहन और प्राकृतिक भोजन की कमी के कारण वन्यजीव अब आबादी वाले इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे फसलों और पशुधन को नुकसान पहुंचने की घटनाएं बढ़ी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएं और अनियंत्रित पर्यटन विस्तार ने वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंचाया है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

विशेषज्ञों की राय

इस शोध से लंबे समय से जुड़े वैज्ञानिक प्रो. आर.के. मैखुरी का कहना है कि इस समस्या को केवल जलवायु परिवर्तन या केवल विकास परियोजनाओं के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।

उनके अनुसार,

“मध्य हिमालय में वर्ष 1988-89 से निरंतर शोध किया जा रहा है। दीर्घकालिक समाधान के लिए वैज्ञानिक रणनीति, सामुदायिक भागीदारी, जल स्रोतों का संरक्षण और औषधीय पौधों का सुनियोजित प्रबंधन बेहद जरूरी है।”

समाधान की दिशा में क्या जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए विकास नीतियों को नए सिरे से प्राथमिकता तय करनी होगी। स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पारंपरिक ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को साथ लेकर ही मध्य हिमालय की जैव विविधता को बचाया जा सकता है।

 

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