नई दिल्ली। यौन अपराध से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में Supreme Court of India ने स्पष्ट किया है कि किसी महिला के पायजामे का नाड़ा खोलना या उसके कपड़े जबरन खींचना केवल ‘तैयारी’ नहीं माना जा सकता, बल्कि परिस्थितियों के आधार पर यह दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) की श्रेणी में आ सकता है। अदालत ने इस मामले में Allahabad High Court के फैसले को निरस्त कर दिया।
हाईकोर्ट की व्याख्या से असहमति
शीर्ष अदालत की तीन-न्यायाधीशीय पीठ ने कहा कि मामले के तथ्यों को देखते हुए आरोपों को महज तैयारी बताना उचित नहीं है। पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया शामिल थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी महिला के वस्त्रों से छेड़छाड़ इस हद तक की जाए कि अपराध की मंशा स्पष्ट झलके, तो उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण की जरूरत
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यौन अपराधों की सुनवाई करते समय केवल तकनीकी कानूनी पहलुओं पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। न्यायिक प्रक्रिया में सहानुभूति, सामाजिक वास्तविकताओं की समझ और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अनिवार्य है। अदालत ने माना कि संकीर्ण व्याख्या न्याय के उद्देश्य को कमजोर कर सकती है।
नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी को निर्देश
इसी संदर्भ में अदालत ने भोपाल स्थित National Judicial Academy को विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति यौन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों में न्यायाधीशों के दृष्टिकोण से जुड़े दिशानिर्देश तैयार करेगी। अदालत ने कहा कि रिपोर्ट तय समयसीमा में प्रस्तुत की जाए।
नई गाइडलाइन से पहले समीक्षा जरूरी
पीठ ने यह भी कहा कि किसी नई गाइडलाइन को अंतिम रूप देने से पहले अब तक किए गए न्यायिक और प्रशासनिक उपायों की समीक्षा की जानी चाहिए, ताकि उनकी वास्तविक प्रभावशीलता का आकलन हो सके। बिना समग्र अध्ययन के नई व्यवस्था लागू करना उचित नहीं होगा।
सरल भाषा और सामाजिक समझ पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि समिति अपनी सिफारिशें तैयार करते समय भाषाविदों, अभियोजकों, अधिवक्ताओं, सामाजिक वैज्ञानिकों और काउंसलरों से भी परामर्श ले। दिशानिर्देश सरल और स्पष्ट भाषा में तैयार किए जाएं, ताकि बच्चे, किशोरियां और समाज के वंचित वर्ग भी उन्हें आसानी से समझ सकें।
अदालत ने यह भी कहा कि कई बार स्थानीय बोलियों में प्रयुक्त शब्दों का कानूनी अर्थ गंभीर हो सकता है, लेकिन आम लोग उससे अनजान रहते हैं। समिति से अपेक्षा की गई है कि वह ऐसे शब्दों और अभिव्यक्तियों की पहचान कर उन्हें संकलित करे, जिससे पीड़ित अपने अनुभव को स्पष्ट रूप से न्यायालय के सामने रख सकें।
स्पष्ट संदेश: न्याय में संवेदनशीलता सर्वोपरि
इस फैसले के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि यौन अपराध के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता, पीड़ित के अधिकारों की रक्षा और व्यापक सामाजिक समझ सर्वोपरि है। अदालत ने यह भी दोहराया कि किसी भी प्रकार की संकीर्ण कानूनी व्याख्या न्याय की भावना को कमजोर नहीं कर सकती।












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