देहरादून/हल्द्वानी। उत्तराखंड में किसानों के नाम पर संचालित कृषि और उद्यान विभाग की योजनाओं में सरकारी धन के खर्च, खरीद, भुगतान, अनुदान और राजस्व से जुड़े मामलों को लेकर किसान मंच उत्तराखंड ने राज्य सरकार से स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष एवं किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय ने दावा किया है कि संगठन के पास उपलब्ध सरकारी अभिलेखों, आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों और ऑडिट रिकॉर्ड की पड़ताल में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्हें जोड़कर देखने पर करीब ₹500 से ₹600 करोड़ की संभावित राजस्व हानि और सरकारी धन के कथित दुरुपयोग की जांच जरूरी है।
किसान मंच ने हालांकि स्पष्ट किया है कि ₹500–600 करोड़ का आंकड़ा संगठन का दावा है और इसकी अंतिम पुष्टि किसी सक्षम स्वतंत्र जांच के बाद ही हो सकती है। मंच का कहना है कि यदि उसके आरोपों में तथ्य नहीं हैं तो सरकार संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करे।
कार्तिक उपाध्याय ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार को खुली चुनौती देते हुए कहा कि किसान मंच अपने पास मौजूद दस्तावेज सामने रखने को तैयार है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री, कृषि-उद्यान मंत्री, विधायक, सांसद, सचिव या संबंधित विभागीय अधिकारी यदि मंच के दावों पर आपत्ति रखते हैं तो सरकार तारीख और स्थान तय करे, मंच अपने दस्तावेजों के साथ जवाब देने के लिए तैयार है।
उन्होंने कहा, “हम दस्तावेज रखेंगे, सरकार जवाब रखे। एक-एक फाइल और एक-एक रुपये के हिसाब पर बात होनी चाहिए।”
किसान मंच के मुताबिक, इससे पहले भी कुछ मामलों को लेकर सरकारी अभिलेखों के आधार पर सवाल उठाए जा चुके हैं। अगस्त में सामने आई एक आरटीआई आधारित रिपोर्ट में पीएम-किसान योजना के तहत अपात्र लाभार्थियों को ₹1152.46 लाख के भुगतान तथा ₹1147.86 लाख की वसूली लंबित होने का उल्लेख किया गया था। इसी रिपोर्ट में तीन संस्थाओं को कुल ₹1444.98 लाख के भुगतान से संबंधित ऑडिट आपत्ति का भी उल्लेख किया गया था।
इसके बाद किसान मंच ने बागेश्वर में पॉलीहाउस और प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के Per Drop More Crop (PDMC) घटक से जुड़े रिकॉर्ड को लेकर जिलाधिकारी से जांच की मांग की। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2021-22 में 591 पॉलीहाउस और ₹300.73 लाख से संबंधित वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वीकृति, लाभार्थी अभिलेख, स्थलीय सत्यापन और भुगतान प्रक्रिया को लेकर मंच ने सवाल उठाए हैं।
मंच ने प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के ड्रिप इरिगेशन से जुड़े वर्ष 2019-20 से 2025-26 तक के रिकॉर्ड की भी स्वतंत्र जांच की मांग की है। इसमें लाभार्थी चयन, सामग्री की खरीद और आपूर्ति, फर्म चयन, भुगतान, ई-वे बिल, जियो-टैगिंग तथा संबंधित अन्य अभिलेखों की जांच की मांग शामिल है।
कार्तिक उपाध्याय का कहना है कि किसान मंच की पड़ताल किसी एक जिले, योजना या अधिकारी तक सीमित नहीं है। संगठन कृषि और उद्यान विभाग में बीज एवं अन्य कृषि सामग्री की खरीद, सरकारी अनुदान, लाभार्थी चयन, फर्मों को भुगतान, डीबीटी, गुणवत्ता परीक्षण, ऑडिट आपत्तियों और सरकारी राजस्व से जुड़े रिकॉर्ड को आपस में मिलाकर जांच की मांग कर रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार चाहे तो किसान मंच द्वारा उठाए गए सभी मामलों की एक साथ स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच करा सकती है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि मंच द्वारा लगाए गए आरोपों में कितना तथ्य है और संबंधित विभागों में अपनाई गई प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप थीं या नहीं।
उपाध्याय ने कहा, “किसान के नाम पर पैसा निकला है तो उसका लाभ किसान के खेत में दिखाई देना चाहिए। सामान खरीदा गया है तो उसकी गुणवत्ता और आपूर्ति का रिकॉर्ड होना चाहिए। भुगतान हुआ है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसे, किस स्वीकृति और किस आधार पर भुगतान किया गया। सरकारी राजस्व बनना था तो वह सरकारी खजाने तक पहुंचा या नहीं, यह दस्तावेजों की जांच से सामने आना चाहिए।”
किसान मंच ने राज्य सरकार से किसानों के नाम पर खर्च किए जा रहे सरकारी धन का योजनावार और लाभार्थीवार विवरण सार्वजनिक करने, संबंधित रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच कराने तथा जांच में किसी अधिकारी, फर्म या अन्य संबंधित पक्ष की जिम्मेदारी सामने आने पर नियमानुसार जवाबदेही तय करने की मांग की है।
उपाध्याय ने सरकार से सवाल करते हुए कहा कि यदि किसान मंच द्वारा उठाए गए आरोप गलत हैं तो सरकार के पास उपलब्ध रिकॉर्ड सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि मंच का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को निशाना बनाना नहीं, बल्कि किसानों के नाम पर खर्च होने वाले सार्वजनिक धन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
गौरतलब है कि ₹500–600 करोड़ की कथित अनियमितता का समग्र आंकड़ा फिलहाल किसान मंच द्वारा किया गया दावा है। उपलब्ध विशिष्ट मामलों में उल्लिखित रकम और आपत्तियां अलग-अलग रिकॉर्ड से संबंधित हैं। इन सभी को जोड़कर किसी अंतिम वित्तीय अनियमितता की पुष्टि अभी किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी या न्यायालय के निष्कर्ष से नहीं हुई है। ऐसे में इस पूरे मामले में स्वतंत्र जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।











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