नई दिल्ली: दिल्ली की एक अदालत ने सात साल की बच्ची से जुड़े यौन अपराध के मामले में फैसला सुनाते हुए न केवल आरोपी को उम्रकैद की सजा दी, बल्कि बच्ची के नाम एक भावुक चिट्ठी भी लिखी। जज ने बच्ची को भरोसा दिलाया कि अदालत उसका खोया हुआ बचपन तो वापस नहीं ला सकती, लेकिन उसके साथ हुई ज्यादती को नजरअंदाज भी नहीं किया गया है।
मामले की सुनवाई के दौरान सात साल की बच्ची ने आरोपी को अदालत में पहचान लिया था और उसके खिलाफ बेझिझक अपनी बात रखी। बच्ची ने अपनी मां को भी घटना के बारे में बताया था। सुनवाई के दौरान उसने अदालत से कहा था कि जिस ‘अंकल’ ने उसके साथ गलत किया है, उसे तब तक जेल में रखा जाए, जब तक वह बूढ़ा न हो जाए।
करीब तीन साल चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद ट्रायल कोर्ट ने सुमित शाक्य को POCSO एक्ट के तहत बच्ची के साथ बार-बार गंभीर यौन शोषण और आपराधिक धमकी देने का दोषी ठहराया। अदालत ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई। इसका अर्थ है कि उसे अपनी शेष जिंदगी जेल में बितानी होगी।
फैसला सुनाने वाली जज रजनी रंगा ने बच्ची के लिए अलग से एक पत्र भी लिखा। पत्र की शुरुआत ‘प्यारी बच्ची’ शब्दों से की गई। जज ने लिखा कि अदालत ने उसकी बात सुनी है और जिस व्यक्ति को वह ‘अंकल’ कहती थी, वह अब आजाद होकर नहीं घूम सकेगा। वह अपनी बाकी जिंदगी जेल में बिताएगा।
जज ने बच्ची की हिम्मत की सराहना करते हुए उसे अदालत के सामने अपनी बात रखने वाली बेहद बहादुर बच्ची बताया। पत्र में कहा गया कि कानून बच्ची का बीता हुआ बचपन वापस नहीं ला सकता, लेकिन उसकी गुहार को सुना गया है और उसके साथ न्याय करने की कोशिश की गई है।
जज ने बच्ची को आगे की जिंदगी खुलकर जीने का संदेश भी दिया। उन्होंने उसे स्कूल जाने, दोस्त बनाने, हंसने-खेलने और अपने सपने पूरे करने के लिए प्रेरित किया।
दिल्ली हाई कोर्ट ने भी फैसले पर जताया भरोसा
इस मामले का विस्तृत खुलासा दिल्ली हाई कोर्ट के 22 सितंबर के आदेश से हुआ। हाई कोर्ट ने आरोपी की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया। जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की ओर से बच्ची के नाम लिखे गए पत्र के भावनात्मक महत्व को भी ध्यान में रखा। अदालत ने संबंधित जिले की दिल्ली लीगल सर्विस अथॉरिटी (DLSA) को निर्देश दिया कि जज का यह पत्र बच्ची को दिए जाने वाले 10.50 लाख रुपये के मुआवजे के साथ सीधे उसे सौंपा जाए।
यह मामला इस बात को भी रेखांकित करता है कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया केवल सजा तक सीमित नहीं होती, बल्कि पीड़ित बच्चे को यह भरोसा देना भी महत्वपूर्ण है कि उसकी बात सुनी गई और उसके अधिकारों की रक्षा की गई।













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