देहरादून: उत्तराखंड में अपराध जांच को और मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। अब राज्य पुलिस को पॉलीग्राफ टेस्ट (Lie Detector Test) के लिए दिल्ली, चंडीगढ़ या हैदराबाद जैसे शहरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। प्रदेश सरकार ने राज्य की फॉरेंसिक साइंस लैब में पॉलीग्राफ टेस्ट की व्यवस्था शुरू करने को मंजूरी दे दी है।
अब तक उत्तराखंड में इस तरह की सुविधा उपलब्ध नहीं थी, जिसके कारण जटिल मामलों में पुलिस को बाहर की लैब का सहारा लेना पड़ता था। इससे जांच में देरी होती थी। लेकिन नई व्यवस्था लागू होने के बाद जांच प्रक्रिया तेज और प्रभावी होने की उम्मीद है।
क्या होता है पॉलीग्राफ टेस्ट?
पॉलीग्राफ टेस्ट में आरोपी के शरीर पर सेंसर लगाए जाते हैं, जो उसके ब्लड प्रेशर, दिल की धड़कन, सांस लेने की गति और पसीने जैसी गतिविधियों को रिकॉर्ड करते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, झूठ बोलने की स्थिति में इन शारीरिक संकेतों में बदलाव आता है, जिसके आधार पर रिपोर्ट तैयार की जाती है।
हालांकि, अदालतें इस टेस्ट को पूरी तरह से प्रमाणिक साक्ष्य नहीं मानतीं, लेकिन पुलिस इसे जांच में सहायक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करती है।
नार्को टेस्ट अभी नहीं
फॉरेंसिक विभाग ने पॉलीग्राफ के साथ-साथ नार्को टेस्ट की भी व्यवस्था का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन फिलहाल केवल पॉलीग्राफ टेस्ट को ही मंजूरी मिली है। नार्को टेस्ट में आरोपी को दवा देकर अर्द्धबेहोशी की स्थिति में पूछताछ की जाती है, जो कई बार विवादों में रहा है।
अदालत की अनुमति जरूरी
किसी भी आरोपी का पॉलीग्राफ या नार्को टेस्ट तभी किया जा सकता है जब वह स्वयं इसकी अनुमति दे और कोर्ट से भी मंजूरी मिल जाए। बिना सहमति के यह टेस्ट कराना कानूनी रूप से संभव नहीं है।
चर्चित मामले
अंकिता भंडारी केस:
इस हाई-प्रोफाइल केस में आरोपियों के पॉलीग्राफ और नार्को टेस्ट की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन बाद में मुख्य आरोपी ने अपनी सहमति वापस ले ली, जिसके चलते हाईकोर्ट ने टेस्ट पर रोक लगा दी।
2008 गैंगरेप केस:
इस मामले में आरोपी का पॉलीग्राफ टेस्ट कराया गया था, जिसके बाद 2013 में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
आंचल पांधी केस:
इस केस में भी आरोपियों से पॉलीग्राफ टेस्ट की अनुमति मांगी गई, लेकिन उन्होंने कोर्ट में सहमति देने से इनकार कर दिया।
क्या होगा फायदा?
- जांच में तेजी आएगी
- पुलिस की निर्भरता अन्य राज्यों पर खत्म होगी
- जटिल मामलों में सच्चाई तक पहुंचना आसान होगा
- समय और संसाधनों की बचत होगी












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