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जौनसारी ST पर उलझा मामला: आखिर किस आधार पर बदली सरकारी व्याख्या?

कोल्टा जांच समिति, लोकुर समिति और केंद्र सरकार के दस्तावेजों से जुड़े कई अहम सवालों पर नई बहस; 2025 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद फिर चर्चा में आया जौनसारी ST प्रमाणपत्र का मुद्दा

देहरादून | खोजी रिपोर्ट | नीरज उत्तराखंडी

उत्तराखंड में जौनसारी अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र को लेकर जारी बहस अब एक बार फिर ऐतिहासिक दस्तावेजों, सरकारी आदेशों और संवैधानिक व्याख्याओं के केंद्र में है। इस विवाद को केवल जातीय पहचान या आरक्षण के सवाल तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे लगभग सात दशक का प्रशासनिक इतिहास, सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां और केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच हुआ पत्राचार जुड़ा है।

इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यह है कि 24 जून 1967 के राष्ट्रपति आदेश में शामिल ‘Jaunsari’ नाम की व्याख्या बाद के वर्षों में किस आधार पर बदली और 2003 में केंद्र सरकार ने इसे ‘क्षेत्रीय शब्द’ (Territorial Term) क्यों बताया?

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, 1956 की कोल्टा जांच समिति, 1965 की लोकुर समिति, 1967 का राष्ट्रपति आदेश, 1991 का केंद्रीय प्रशासनिक रिकॉर्ड, 2001 का केंद्र-राज्य पत्राचार और 21 अप्रैल 2003 को राज्यसभा में दिया गया सरकारी जवाब इस विवाद को समझने के लिए महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।

1956 की कोल्टा जांच समिति ने उजागर किया था सामाजिक शोषण का सवाल

जौनसार-बावर में सामाजिक असमानता और शोषण का मुद्दा दशकों पहले सरकारी स्तर पर उठ चुका था। उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 1956 में कोल्टा समुदाय की सामाजिक-आर्थिक स्थिति की जांच के लिए एक समिति गठित की थी। इसके अध्यक्ष बलदेव सिंह आर्य थे।

समिति का उद्देश्य अनुसूचित जनजाति की सूची निर्धारित करना नहीं, बल्कि कोल्टा समुदाय की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और उसके सामने मौजूद शोषण की समस्याओं की जांच करना था।

1963 में राज्यसभा की कार्यवाही के दौरान इस समिति की रिपोर्ट का उल्लेख किया गया। संसदीय चर्चा में बताया गया कि कोल्टा समुदाय के कुछ लोग छोटे-छोटे कर्ज के बदले साहूकारों के यहां काम करने को मजबूर थे। उन्हें मजदूरी के बजाय भोजन और कपड़े दिए जाने तथा कर्ज और ब्याज के कारण लंबे समय तक श्रम करने जैसी परिस्थितियों का जिक्र हुआ। कुछ मामलों में यह व्यवस्था पीढ़ियों तक चलने की बात भी सामने आई।

यह रिकॉर्ड जौनसार-बावर की सामाजिक संरचना को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, कोल्टा जांच समिति की रिपोर्ट को सीधे अनुसूचित जनजाति की संवैधानिक अधिसूचना का आधार मानना सही नहीं होगा। सामाजिक-आर्थिक जांच और संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत ST सूची में किसी समुदाय को शामिल करना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

1965 की लोकुर समिति से 1967 के राष्ट्रपति आदेश तक

वर्ष 1965 में गठित लोकुर समिति का संबंध अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूचियों की समीक्षा से था। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में समिति के रिकॉर्ड में भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू जैसे नामों का उल्लेख मिलता है।

इसके बाद 24 जून 1967 को संविधान (अनुसूचित जनजातियां) उत्तर प्रदेश आदेश जारी हुआ। इस आदेश के तहत उत्तर प्रदेश की अनुसूचित जनजातियों की सूची में ‘Jaunsari/Jannsari’ नाम शामिल हुआ।

यही वह महत्वपूर्ण पड़ाव था, जिसके बाद जौनसारी नाम संवैधानिक ST सूची का हिस्सा बना।

हालांकि, यहां दो बातों के बीच अंतर समझना जरूरी है। पहली, राष्ट्रपति के आदेश में अधिसूचित नाम क्या है। दूसरी, बाद के प्रशासनिक दस्तावेजों में उस नाम के आधार पर किसी व्यक्ति की ST पात्रता का निर्धारण किस तरह किया गया।

जौनसारी ST प्रमाणपत्र को लेकर वर्तमान बहस की एक प्रमुख कड़ी इसी अंतर से जुड़ी है।

1969 में जौनसारी प्रतिनिधिमंडल ने संसद के सामने रखा था पक्ष

1967 के राष्ट्रपति आदेश के बाद जौनसारी पहचान और ST सूची से जुड़े प्रश्न संसदीय स्तर पर भी सामने आए।

वर्ष 1969 की संयुक्त संसदीय समिति की कार्यवाही में चकराता, देहरादून के जौनसारी प्रतिनिधिमंडल का उल्लेख मिलता है। रिकॉर्ड के अनुसार, प्रतिनिधिमंडल ने समिति के समक्ष मौखिक साक्ष्य दिया था और लिखित ज्ञापन भी प्रस्तुत किया था।

हालांकि, उपलब्ध पड़ताल में उस मूल ज्ञापन की पूरी स्वतंत्र प्रति सामने नहीं आई है। इसलिए उसमें दर्ज मांगों और तर्कों के बारे में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए मूल दस्तावेज का मिलना आवश्यक है।

1980 के शासन पत्र से 1991 के केंद्रीय रिकॉर्ड तक क्या सामने आया?

इस विवाद में 21 अगस्त 1980 का उत्तर प्रदेश शासन पत्र भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका पत्रांक 2276/26-3-80-4/51/80 बताया गया है।

8 अप्रैल 1991 के केंद्रीय प्रशासनिक रिकॉर्ड में इस पत्र का संदर्भ मिलता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश की ST सूची में पांच अधिसूचित समुदायों—भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू—का उल्लेख किया था। साथ ही, 1980 के पत्र में उल्लिखित अन्य समुदायों को तत्कालीन ST सूची में शामिल नहीं माना गया।

इससे स्पष्ट होता है कि 1991 के केंद्रीय रिकॉर्ड में जौनसारी को अधिसूचित ST समुदाय के रूप में दर्ज किया गया था।

हालांकि, 1980 के मूल शासन पत्र और उससे संबंधित नोटशीट की पूरी प्रति उपलब्ध न होने के कारण उस पत्र में दर्ज तर्कों और उसके वास्तविक प्रशासनिक उद्देश्य पर अंतिम निष्कर्ष निकालना अभी संभव नहीं है।

2001 में फिर उठा ‘खस जौनसारी’ की ST स्थिति का सवाल

वर्ष 2001 में यह मामला एक बार फिर केंद्र और तत्कालीन उत्तरांचल सरकार के बीच पत्राचार के जरिए सामने आया।

न्यायिक रिकॉर्ड में 28 अगस्त 2001 के उत्तरांचल शासन के पत्र और 10 सितंबर 2001 के जनजातीय कार्य मंत्रालय के पत्र का उल्लेख मिलता है। इन दस्तावेजों का संबंध ‘खस जौनसारी’ यानी ब्राह्मण और राजपूत वर्ग की ST स्थिति से जुड़े सवालों से था।

इस पत्राचार से संकेत मिलता है कि उस समय भी ‘जौनसारी’ नाम के दायरे और ST पात्रता को लेकर प्रशासनिक स्तर पर प्रश्न मौजूद थे।

21 अप्रैल 2003: राज्यसभा में दिए गए जवाब ने बढ़ाई बहस

इस पूरे विवाद की सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक 21 अप्रैल 2003 को राज्यसभा में दिया गया केंद्र सरकार का लिखित उत्तर है।

उपलब्ध संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार, तत्कालीन सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. सत्यनारायण जटिया ने ‘Jaunsari’ को “a territorial term encompassing all the residents of the area” यानी क्षेत्र के सभी निवासियों को समेटने वाला क्षेत्रीय शब्द बताया था।

इसी जवाब में जौनसार-बावर के कोल्टा और बजगी समुदायों के लोगों को निर्धारित शर्तों के अधीन जौनसार के नाम पर ST लाभ का पात्र बताया गया था। इसमें यह शर्त भी दर्ज थी कि संबंधित दावेदार अथवा उसके माता-पिता 24 जून 1967 को जौनसार क्षेत्र के स्थायी निवासी रहे हों।

यहीं से इस मामले में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और संवैधानिक प्रश्न सामने आता है—यदि 1991 के केंद्रीय रिकॉर्ड में जौनसारी को अधिसूचित ST समुदाय के रूप में दर्ज किया गया था, तो 2003 में इसे क्षेत्रीय शब्द मानने की व्याख्या किस आधार पर की गई?

इस सवाल का उत्तर तलाशने के लिए 2003 के संसदीय जवाब के पीछे मौजूद मंत्रालयी फाइल, संबंधित शासन पत्रों और कानूनी राय का परीक्षण जरूरी है।

क्या 1967 के राष्ट्रपति आदेश में भी ‘क्षेत्रीय शब्द’ का उल्लेख था?

उपलब्ध पड़ताल के अनुसार, 1967 के राष्ट्रपति आदेश के मूल पाठ में 2003 के जवाब में इस्तेमाल किए गए ‘Territorial Term’ वाले शब्द नहीं दिखाई देते।

यह अंतर इस मामले को और महत्वपूर्ण बनाता है। हालांकि, केवल शब्दों के अंतर के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि बाद की प्रशासनिक व्याख्या अपने आप में वैध या अवैध थी। इसके लिए संबंधित आदेशों, नियमों, आधिकारिक फाइलों और न्यायिक निर्णयों का समग्र परीक्षण आवश्यक है।

सबसे अहम सवाल यही है कि 2003 के जवाब में जौनसारी को क्षेत्रीय शब्द मानने के पीछे कौन-सा सरकारी दस्तावेज, कानूनी राय या पूर्व निर्णय आधार बना था।

इसकी पुष्टि के लिए संबंधित मंत्रालय की मूल फाइल और नोटशीट सार्वजनिक होना महत्वपूर्ण है।

जौनसार-बावर की सामाजिक संरचना भी है विवाद की अहम पृष्ठभूमि

जौनसार-बावर की सामाजिक संरचना पर हुए ऐतिहासिक अध्ययनों में क्षेत्र के भीतर विभिन्न सामाजिक और पेशागत समुदायों का उल्लेख मिलता है।

मानवशास्त्री डी.एन. मजूमदार और उनकी टीम ने 1955 से 1957 के बीच जौनसार-बावर में क्षेत्रीय अध्ययन किया था। बाद में 1962 में उनकी पुस्तक Himalayan Polyandry: A Study of Jaunsar-Bawar प्रकाशित हुई।

इस अध्ययन में जौनसार समाज की सामाजिक संरचना और विभिन्न समूहों के बीच मौजूद अंतर का वर्णन किया गया है। यह अध्ययन क्षेत्र के सामाजिक इतिहास को समझने में मदद करता है, लेकिन अपने आप किसी व्यक्ति की संवैधानिक ST पात्रता निर्धारित नहीं करता।

इसी तरह, कोल्टा जांच समिति का रिकॉर्ड भी क्षेत्र में मौजूद सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। दोनों को संवैधानिक अधिसूचना और व्यक्तिगत पात्रता के प्रश्न से अलग रखकर देखना आवश्यक है।

2025 में हाईकोर्ट के आदेश के बाद फिर चर्चा में आया मामला

2 मई 2025 के उत्तराखंड हाईकोर्ट के आदेश के बाद जौनसारी ST प्रमाणपत्र का विवाद फिर चर्चा में आया। इस मामले के केंद्र में यह प्रश्न है कि क्या किसी अधिसूचित क्षेत्र में निवास करना ही ST पात्रता के लिए पर्याप्त है, या संबंधित व्यक्ति का राष्ट्रपति के आदेश में अधिसूचित समुदाय से जुड़ा होना भी आवश्यक है।

इस प्रश्न का उत्तर संबंधित कानूनी प्रावधानों, राष्ट्रपति के आदेश, लागू प्रशासनिक निर्देशों और न्यायिक निर्णयों के संदर्भ में ही निर्धारित किया जा सकता है।

इसलिए किसी एक समुदाय के सभी लोगों को एक साथ पात्र या अपात्र ठहराने के बजाय प्रत्येक दावे और उससे संबंधित दस्तावेजों की कानूनी कसौटी पर जांच महत्वपूर्ण है।

सात दशक के दस्तावेजों से उभरते हैं तीन अहम सवाल

उपलब्ध दस्तावेजी पड़ताल से तीन प्रमुख बातें सामने आती हैं।

पहली: 1956 की कोल्टा जांच समिति ने जौनसार-बावर में सामाजिक-आर्थिक शोषण के सवाल को सरकारी विमर्श में दर्ज किया था। हालांकि, इस समिति की रिपोर्ट को सीधे ST अधिसूचना का आधार नहीं कहा जा सकता।

दूसरी: 1965 की लोकुर समिति और 24 जून 1967 के राष्ट्रपति आदेश के बाद जौनसारी नाम उत्तर प्रदेश की ST सूची का हिस्सा बना। 1991 के केंद्रीय प्रशासनिक रिकॉर्ड में भी जौनसारी का उल्लेख अधिसूचित ST समुदाय के रूप में मिलता है।

तीसरी: 21 अप्रैल 2003 के राज्यसभा उत्तर में जौनसारी को क्षेत्रीय शब्द बताते हुए कोल्टा और बजगी समुदायों के लिए निर्धारित शर्तों के अधीन ST लाभ की पात्रता का उल्लेख किया गया। इस व्याख्या का मूल प्रशासनिक आधार स्पष्ट करने के लिए संबंधित सरकारी अभिलेखों की पूरी जांच जरूरी है।

सरकार से मूल दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग क्यों महत्वपूर्ण?

इस विवाद की पूरी तस्वीर सामने लाने के लिए कुछ दस्तावेजों की उपलब्धता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इनमें 21 अगस्त 1980 के उत्तर प्रदेश शासन पत्र की मूल प्रति और नोटशीट, 1969 के जौनसारी प्रतिनिधिमंडल का ज्ञापन तथा 2001 से 2003 के बीच जनजातीय कार्य मंत्रालय में हुए पत्राचार और निर्णयों की फाइलें शामिल हैं।

इन दस्तावेजों के सार्वजनिक होने से यह समझने में मदद मिल सकती है कि 1967 के राष्ट्रपति आदेश के बाद ‘Jaunsari’ नाम की प्रशासनिक व्याख्या किस प्रक्रिया से विकसित हुई और 2003 के जवाब में उल्लिखित शर्तों का आधार क्या था।

 जौनसारी ST प्रमाणपत्र विवाद का समाधान केवल ऐतिहासिक संदर्भों या अलग-अलग पक्षों की दलीलों से नहीं हो सकता। इसके लिए संवैधानिक आदेश, अधिकृत सरकारी रिकॉर्ड, लागू कानूनी प्रावधान और प्रत्येक दावेदार की पात्रता की पारदर्शी जांच जरूरी है।

सात दशक पुराने इस विवाद में सबसे महत्वपूर्ण जरूरत है कि संबंधित मूल दस्तावेज सार्वजनिक हों और उनके आधार पर तथ्यात्मक तथा कानूनी स्थिति स्पष्ट की जाए, ताकि किसी भी समुदाय के अधिकारों और संवैधानिक प्रावधानों को लेकर अनावश्यक भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।

 

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