पसंदीदा पोस्ट’ की मांग पड़ी महंगी! कोर्ट ने IFS अधिकारी को दिया बड़ा झटका

देहरादून: केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) की प्रधान पीठ ने भारतीय वन सेवा (IFS) के वरिष्ठ अधिकारी सुशांत कुमार पटनायक को बड़ा झटका देते हुए उनकी अंतरिम याचिका खारिज कर दी है। अधिकरण ने न सिर्फ राहत देने से इनकार किया, बल्कि 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया।

अंतरिम राहत को बताया अंतिम मांग जैसा

अधिकरण ने अपने आदेश में साफ कहा कि याचिका की प्रकृति ऐसी थी मानो याचिकाकर्ता अंतरिम स्तर पर ही अंतिम राहत हासिल करना चाहते हों। न्यायिक प्रक्रिया में इस तरह की मांग स्वीकार्य नहीं है, इसलिए याचिका को खारिज कर दिया गया।

क्या है पूरा मामला?

सुशांत कुमार पटनायक ने 25 जनवरी 2024 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन्हें उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB) के सदस्य सचिव पद से हटाया गया था।
उन्होंने अपनी 25 अप्रैल 2023 की नियुक्ति के आधार पर दोबारा उसी पद पर बहाली और पे लेवल-15 का लाभ मांगा था।

याचिकाकर्ता के तर्क

पटनायक की ओर से कहा गया कि:

  • उनके खिलाफ कार्रवाई बिना उचित प्रक्रिया के की गई
  • स्थानीय शिकायत समिति के गठन से पहले ही आदेश जारी हुआ
  • पहले के अधिकरण आदेश (9 जनवरी 2025 और 16 दिसंबर 2025) का पालन नहीं किया गया

राज्य सरकार का जवाब

राज्य सरकार ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि:

  • UKPCB नियम 2021 के तहत 6 जनवरी 2026 को उनकी प्रतिनियुक्ति समाप्त कर दी गई थी
  • यह नियम वित्तीय अनियमितता या कदाचार की स्थिति में समय से पहले हटाने की अनुमति देता है
  • सबसे अहम, इस आदेश को मूल याचिका में चुनौती ही नहीं दी गई

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि पटनायक 1 अप्रैल 2025 से अपने मूल कैडर में देहरादून में मुख्य वन संरक्षक (CCF) के पद पर कार्यरत हैं और उन्हें न वेतन हानि हुई, न पदावनति।

CAT की सख्त टिप्पणी

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि:

  • किसी भी अधिकारी को प्रतिनियुक्ति पद पर बने रहने का वैधानिक अधिकार नहीं होता
  • अपनी पसंद की पोस्टिंग मांगना भी अधिकार के दायरे में नहीं आता
  • अंतरिम आदेश के जरिए अंतिम राहत नहीं दी जा सकती

सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए अधिकरण ने इन सिद्धांतों को दोहराया।

याचिका को बताया न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग

न्यायिक सदस्य अजय प्रताप सिंह और प्रशासनिक सदस्य राजेंद्र कश्यप की पीठ ने कहा कि मामला हस्तक्षेप योग्य नहीं है।
पीठ के अनुसार, यह याचिका न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होती है, इसलिए इसे जुर्माने के साथ खारिज किया जाता है।

क्या संदेश गया इस फैसले से?

इस फैसले से साफ हो गया है कि:

  • प्रतिनियुक्ति पदों पर बने रहने का अधिकार सीमित होता है
  • अंतरिम राहत के नाम पर अंतिम परिणाम पाने की कोशिश अदालत में स्वीकार्य नहीं है

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