उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के धौलादेवी ब्लॉक स्थित नौगांव गांव में विकास की एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो पहाड़ों में बुनियादी सुविधाओं की जमीनी हकीकत को उजागर करती है।
जहां एक ओर ग्रामीण वर्षों से पक्की सड़क के इंतजार में थे, वहीं अब सड़क निर्माण की शुरुआत होते ही गांव दो हिस्सों में बंटता नजर आ रहा है।
डोली के सहारे अस्पताल: आज भी जूझ रहा है नौगांव
नौगांव में लंबे समय से सड़क सुविधा का अभाव रहा है। यहां बीमार मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए आज भी डोली (पालकी) का सहारा लेना पड़ता है। खासकर बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण गंभीर हालात भी पैदा हो जाते हैं। सड़क की कमी यहां सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत का सवाल बन चुकी है।
सड़क निर्माण शुरू होते ही विवाद: जमीन बनी बड़ी रुकावट
सरकार द्वारा सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू किए जाने पर गांव के अधिकांश लोगों ने अपनी जमीन देने के लिए सहमति जताई। लेकिन कुछ परिवारों द्वारा जमीन और मुआवजे को लेकर आपत्ति दर्ज कर दी गई।
इसी विरोध के कारण सड़क निर्माण का काम फिलहाल रुक गया है। परिणामस्वरूप, गांव के भीतर विकास को लेकर दो अलग-अलग विचारधाराएं सामने आ गई हैं—एक जो विकास के पक्ष में है और दूसरा जो अपनी शर्तों पर विकास चाहता है।
विकास बनाम व्यक्तिगत अधिकार: पहाड़ की पुरानी समस्या
उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में विकास कार्य अक्सर जमीन, मुआवजे और पारंपरिक अधिकारों के विवाद में फंस जाते हैं। नौगांव का मामला भी इसी व्यापक समस्या का उदाहरण है।
यह सवाल अब फिर से खड़ा हो गया है—
- क्या विकास के लिए सामूहिक सोच जरूरी है?
- क्या व्यक्तिगत आपत्तियां पूरे गांव के भविष्य को रोक सकती हैं?
- और क्या प्रशासन इन मुद्दों का समय रहते समाधान निकाल पाएगा?
प्रशासन से अपील: जल्द बने सहमति, नहीं तो बढ़ेगा संकट
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रशासन से अपील की है कि सभी पक्षों को एक साथ बैठाकर जल्द से जल्द समाधान निकाला जाए। क्योंकि सड़क सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़ी बुनियादी जरूरत है।
नौगांव को चाहिए सड़क भी, और एकता भी
नौगांव के लोगों को सड़क का पूरा अधिकार है, लेकिन गांव की सामाजिक एकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। विकास तभी सार्थक होगा, जब वह सभी को साथ लेकर आगे बढ़े।
निष्कर्ष: पहाड़ में विकास की राह क्यों कठिन है?
नौगांव की यह घटना एक बड़ा संदेश देती है कि पहाड़ों में विकास सिर्फ योजनाएं बनाने से नहीं होगा, बल्कि जमीनी स्तर पर संवाद, सहमति और सामूहिक भागीदारी जरूरी है।
अगर समय रहते समाधान नहीं निकला, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है।












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