नियुक्तियों का खेल या प्रशासनिक चूक? स्वास्थ्य विभाग के फैसलों पर उठे गंभीर प्रश्न

देहरादून। उत्तराखंड स्वास्थ्य विभाग में विशेषज्ञ चिकित्सकों (Specialist Doctors) की नियुक्ति और तैनाती को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरटीआई कार्यकर्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता चन्द्र शेखर जोशी ने इस मामले में उत्तराखंड मानवाधिकार आयोग में विस्तृत शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती के दौरान निर्धारित नियमों और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया, जिससे आम नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती प्रक्रिया पर सवाल

मानवाधिकार आयोग में दायर शिकायत के अनुसार, 28 अप्रैल 2025 को सचिव चिकित्सा, उत्तराखंड द्वारा जारी आदेश के माध्यम से 45 चिकित्सकों को विभिन्न सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सक के रूप में तैनात किया गया था। शिकायतकर्ता का दावा है कि उस समय इन चिकित्सकों में से केवल 10 ही ऐसे थे जो आवश्यक शैक्षणिक योग्यता और वैध विशेषज्ञ पंजीकरण की शर्तों को पूरा करते थे।

आरटीआई के माध्यम से प्राप्त अभिलेखों और विभागीय दस्तावेजों का हवाला देते हुए शिकायत में कहा गया है कि कई चिकित्सकों के पास उत्तराखंड मेडिकल काउंसिल (UMC) में विशेषज्ञ के रूप में वैध पंजीकरण नहीं था, जबकि कुछ चिकित्सकों ने संबंधित विषय में पीजी परीक्षा भी उत्तीर्ण नहीं की थी।

विभागीय पत्र में भी सामने आई पंजीकरण की स्थिति

शिकायत में उल्लेख किया गया है कि महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य द्वारा 30 जनवरी 2026 को जारी पत्र संख्या-2980 में स्वयं यह स्वीकार किया गया था कि तैनाती के लिए प्रस्तावित 30 विशेषज्ञ चिकित्सकों में से केवल 12 चिकित्सकों के पास ही वैध विशेषज्ञ पंजीकरण उपलब्ध था।

दस्तावेजों के अनुसार:

  • 12 चिकित्सकों के पास वैध विशेषज्ञ पंजीकरण था।
  • 16 चिकित्सकों के पास विशेषज्ञ पंजीकरण प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं था।
  • 2 चिकित्सकों ने संबंधित पीजी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं की थी।

इसके बावजूद, शिकायत के अनुसार, 17 मार्च 2026 को सभी 30 चिकित्सकों की तैनाती को स्वीकृति प्रदान कर दी गई।

मरीज की मृत्यु का भी किया गया उल्लेख

शिकायतकर्ता ने अपने प्रार्थना पत्र में एक पूर्व मामले का भी उल्लेख किया है। आरोप है कि सितारगंज उप-जिला चिकित्सालय में स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के रूप में तैनात एक चिकित्सक की योग्यता और पंजीकरण को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए गए थे।

शिकायत के अनुसार, उक्त चिकित्सक की तैनाती के कुछ समय बाद उपचार के दौरान एक महिला मरीज की मृत्यु हुई थी। इस मामले में जांच और आपराधिक मुकदमा दर्ज होने की कार्रवाई भी सामने आने की बात कही गई है।

अनुच्छेद-21 के उल्लंघन का लगाया आरोप

मानवाधिकार आयोग में दायर शिकायत में कहा गया है कि जब विभागीय अधिकारियों को संबंधित चिकित्सकों की पात्रता, योग्यता और पंजीकरण संबंधी स्थिति की जानकारी थी, तब भी उनकी नियुक्ति और तैनाती को स्वीकृति देना अत्यंत गंभीर विषय है।

शिकायतकर्ता ने इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रदत्त जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार से जोड़ते हुए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग की है।

मानवाधिकार आयोग से की गई प्रमुख मांगें

शिकायत में आयोग से निम्नलिखित मांगें की गई हैं:

  • पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए।
  • जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय कर कार्रवाई की जाए।
  • अयोग्य अथवा अपंजीकृत विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती तत्काल समाप्त की जाए।
  • भविष्य में विशेषज्ञ चिकित्सकों की नियुक्ति से पहले UMC और NMC Registration का अनिवार्य सत्यापन किया जाए।
  • शैक्षणिक योग्यता एवं विशेषज्ञता संबंधी दस्तावेजों की जांच के बाद ही तैनाती सुनिश्चित की जाए।

स्वास्थ्य विभाग की प्रतिक्रिया का इंतजार

फिलहाल स्वास्थ्य विभाग की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि यदि जांच में शिकायत में लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मामला उत्तराखंड के स्वास्थ्य प्रशासन में नियुक्तियों और तैनाती प्रक्रियाओं से जुड़े सबसे बड़े विवादों में से एक साबित हो सकता है।

यह समाचार मानवाधिकार आयोग में प्रस्तुत शिकायत, आरटीआई के माध्यम से प्राप्त दस्तावेजों तथा उपलब्ध विभागीय अभिलेखों पर आधारित है। समाचार में उल्लिखित सभी आरोप जांच और आयोग के अंतिम निर्णय के अधीन हैं। स्वास्थ्य विभाग की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी समाचार में शामिल किया जाएगा।

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