उत्तरकाशी। दयारा बुग्याल ट्रैक से लापता हुई 24 वर्षीय एमबीए छात्रा बबीता पांडे का 27 दिन बाद भी कोई सुराग नहीं मिल पाया है। पुलिस, प्रशासन, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, आईटीबीपी, वन विभाग, नेहरू पर्वतारोहण संस्थान और स्थानीय ग्रामीणों की संयुक्त खोज के बावजूद अब तक सफलता हाथ नहीं लगी है। इस बीच क्षेत्र में प्रचलित परियों (आंचरी) की लोककथाएं एक बार फिर चर्चा में आ गई हैं और कुछ लोग इस रहस्यमयी गुमशुदगी को उनसे जोड़कर देख रहे हैं।
क्या है बबीता पांडे के लापता होने का मामला?
रामनगर निवासी 24 वर्षीय बबीता पांडे 29 मई को उत्तरकाशी के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल दयारा बुग्याल ट्रैक पर गई थीं। इसके बाद वह रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गईं। घटना के बाद से लगातार बड़े स्तर पर सर्च ऑपरेशन चलाया जा रहा है।
खोज अभियान में आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग किया जा रहा है, जिसमें ड्रोन, मोबाइल सर्विलांस, कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR), सीसीटीवी फुटेज विश्लेषण और अन्य तकनीकी संसाधन शामिल हैं। बावजूद इसके, अब तक जांच एजेंसियों को कोई ठोस सुराग नहीं मिला है।
उत्तराखंड की लोककथाओं में ‘आंचरी’ या परियों का जिक्र
उत्तराखंड की लोक संस्कृति और लोककथाओं में परियों को ‘आंचरी’ या वन देवी के रूप में जाना जाता है। विशेष रूप से टिहरी जिले में स्थित खैट पर्वत को स्थानीय मान्यताओं में “परियों का देश” कहा जाता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में परियों के निवास से जुड़ी अनेक कहानियां पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं। हालांकि इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, फिर भी ग्रामीण समाज में इनकी चर्चा आज भी होती है।
स्थानीय लोगों में चर्चा का विषय बना मामला
दयारा बुग्याल क्षेत्र में लंबे समय से ट्रैकिंग गतिविधियों से जुड़े कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि यह इलाका घने जंगलों और ऊंचे पर्वतों से घिरा हुआ है। उनके अनुसार, कई बार सुनसान क्षेत्रों में लोगों को किसी अदृश्य उपस्थिति का एहसास होता है, जिसे लोक मान्यताओं में परियों से जोड़ा जाता है।
हालांकि नई पीढ़ी इन कथाओं को अंधविश्वास मानती है, लेकिन पहाड़ों में आज भी कई बुजुर्ग इन कहानियों को सच मानते हैं।
खैट पर्वत और नौ बहनों की प्रसिद्ध कथा
स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, चौड़ा गांव की नौ सुंदर बहनें एक दिन खैट पर्वत की ओर दिखाई देने वाली रहस्यमयी रोशनी का पीछा करते हुए वहां पहुंचीं और फिर कभी वापस नहीं लौटीं। मान्यता है कि वे परियां बन गईं और आज भी क्षेत्र की रक्षा करती हैं।
यह कहानी उत्तराखंड की सबसे प्रसिद्ध लोककथाओं में से एक मानी जाती है।
जीतू बगड़वाल और परियों की कहानी
उत्तराखंड की लोक परंपराओं में जीतू बगड़वाल की कथा भी काफी लोकप्रिय है। कहा जाता है कि जीतू अपनी मधुर बांसुरी की धुन के लिए प्रसिद्ध था। लोक मान्यता के अनुसार, एक बार खैट पर्वत के समीप बांसुरी बजाते समय परियां उसकी धुन से आकर्षित हो गईं और उसे अपने साथ ले गईं।
हालांकि यह केवल एक लोककथा है, लेकिन आज भी पहाड़ों में इसे बड़े चाव से सुनाया जाता है।
लोक मान्यताओं में क्या-क्या सावधानियां बताई जाती हैं?
हिमालयी क्षेत्रों से जुड़ी लोक मान्यताओं में कहा जाता है कि:
- ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तेज शोर नहीं करना चाहिए।
- चिल्लाना, हुड़दंग मचाना या अत्यधिक संगीत बजाना वर्जित माना जाता है।
- चमकीले और भड़कीले कपड़े पहनने से बचने की सलाह दी जाती है।
- प्राकृतिक स्थलों का सम्मान करना चाहिए।
हालांकि इन बातों का कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
100 से अधिक लोग कर रहे हैं तलाश
बबीता पांडे की खोज में 100 से अधिक लोग लगातार जुटे हुए हैं। बचाव दलों ने जंगल, पहाड़, खाई, जलस्रोत और आसपास के सभी संभावित क्षेत्रों में तलाश की है।
जांच एजेंसियों का कहना है कि मामला पूरी तरह वैज्ञानिक और तकनीकी जांच के आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है और हर संभावित पहलू की जांच की जा रही है।
अफवाहों से बचने की अपील
प्रशासन और स्थानीय सामाजिक संगठनों ने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और जांच एजेंसियों का सहयोग करने की अपील की है। अधिकारियों का कहना है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों और साक्ष्यों का इंतजार करना जरूरी है।
अब भी बना हुआ है रहस्य
27 दिन बीत जाने के बाद भी बबीता पांडे की गुमशुदगी रहस्य बनी हुई है। परिवार उनकी सुरक्षित वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है, जबकि पुलिस और बचाव दल लगातार हर संभावित सुराग पर काम कर रहे हैं।
फिलहाल पूरे उत्तराखंड की नजरें इस बहुचर्चित मामले की जांच और उसके परिणामों पर टिकी हुई हैं।











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