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मंत्री के पति को जाना होगा जेल! कोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका की खारिज

देहरादून : उत्तराखंड की कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य से जुड़े कथित उत्पीड़न, जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल और आपराधिक षड्यंत्र के आरोपों के मामले में उनके पति गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी को अदालत से राहत नहीं मिली है। देहरादून की विशेष अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत के इस फैसले के बाद मामले में आगे की पुलिस कार्रवाई और जांच की दिशा पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

यह आदेश पांचवीं अपर सत्र न्यायाधीश एवं एससी-एसटी एक्ट की विशेष न्यायाधीश अंजलि बेंजवाल की अदालत ने सुनाया। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध की ओर संकेत करते हैं। इसी आधार पर अदालत ने अधिनियम की धारा 18 और 18ए के तहत अग्रिम जमानत पर लागू प्रतिबंध को ध्यान में रखते हुए याचिका खारिज कर दी।

15 अक्टूबर को कैंट थाने में दर्ज हुई थी FIR

मामले के अनुसार, कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य ने 15 अक्टूबर 2026 को देहरादून के कैंट थाने में अपने पति गिरधारी लाल साहू के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। शिकायत में जान से मारने का आपराधिक षड्यंत्र रचने और एससी-एसटी एक्ट से संबंधित आरोप लगाए गए हैं।

एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2004 में मंत्री के आवास पर मौजूद स्टाफ के सामने उनके पति ने कथित तौर पर जातिसूचक और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। हालांकि, ये आरोप हैं और इनकी सत्यता का निर्धारण जांच तथा आगे की न्यायिक प्रक्रिया में होगा।

घरेलू और आर्थिक विवाद का बचाव पक्ष ने दिया हवाला

अग्रिम जमानत की मांग करते हुए बचाव पक्ष ने अदालत में कहा कि रेखा आर्य और गिरधारी लाल साहू करीब 22 वर्षों से पति-पत्नी हैं और दोनों के बीच घरेलू तथा आर्थिक मामलों को लेकर विवाद चल रहा है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि इसी विवाद की पृष्ठभूमि में मुकदमा दर्ज कराया गया है।

आरोपी की ओर से अधिवक्ता विपिन जोशी और वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद वशिष्ठ ने पक्ष रखा। उन्होंने प्राथमिकी दर्ज कराने में हुई कथित देरी पर भी सवाल उठाए। बचाव पक्ष का तर्क था कि जिस घटना के आधार पर आरोप लगाए गए हैं, वह काफी पुरानी है और उसके संबंध में वर्षों बाद प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

बंद कमरे में घटना होने की दलील पर भी हुई बहस

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने यह दलील भी दी कि कथित घटना घर के भीतर एक कमरे में हुई थी। ऐसे में सार्वजनिक रूप से अपमानित किए जाने से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए।

बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2020 के पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ मामले के फैसले सहित अन्य न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत अग्रिम जमानत पर रोक लागू होने के लिए प्राथमिकी में प्रथम दृष्टया अपराध बनना आवश्यक है। साथ ही, मंत्री के पद और प्रभाव को देखते हुए गिरफ्तारी की आशंका भी जताई गई।

अभियोजन ने कहा- स्टाफ के सामने अपमानित करने का आरोप

सरकारी पक्ष की ओर से विशेष लोक अभियोजक गोविंद सिंह ने अग्रिम जमानत याचिका का विरोध किया। अभियोजन ने अदालत में दलील दी कि प्राथमिकी में स्टाफ की मौजूदगी में जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर अपमानित करने का स्पष्ट आरोप लगाया गया है।

अभियोजन के अनुसार, कथित घटना के समय अन्य लोगों की मौजूदगी के आरोप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। केवल घटना के घर के भीतर होने के आधार पर उसे सार्वजनिक दृष्टि से पूरी तरह अलग नहीं माना जा सकता।

सरकारी पक्ष ने अदालत से कहा कि प्राथमिकी में दर्ज आरोप प्रथम दृष्टया एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध की ओर संकेत करते हैं। इसलिए अधिनियम की धारा 18 और 18ए के तहत अग्रिम जमानत पर प्रतिबंध लागू माना जाना चाहिए।

अदालत ने क्यों खारिज की अग्रिम जमानत याचिका?

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने माना कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध की श्रेणी में आते दिखाई देते हैं। अदालत ने बचाव पक्ष की ओर से पेश न्यायिक फैसलों को मौजूदा मामले की परिस्थितियों के संदर्भ में राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

इसी कानूनी आधार पर अदालत ने गिरधारी लाल साहू उर्फ पप्पू गिरधारी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी। इस फैसले से उन्हें अग्रिम जमानत के जरिए गिरफ्तारी से सुरक्षा नहीं मिली है।

अब आगे क्या होगा?

अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद मामले में पुलिस की आगे की कार्रवाई और जांच महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, अदालत के इस आदेश को आरोपों का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। अग्रिम जमानत पर राहत न मिलना और किसी आरोपी का दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं।

अब देखना होगा कि इस मामले में जांच किस दिशा में आगे बढ़ती है और संबंधित एजेंसियां आगे क्या कदम उठाती हैं। फिलहाल, मंत्री रेखा आर्य से जुड़े इस प्रकरण में अदालत के फैसले ने कानूनी और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है।

 

 

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