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96% मुस्लिम आबादी वाले अजरबैजान में हिजाब पर हंगामा, छात्राओं के स्कूल जाने पर विवाद

अजरबैजान: करीब 96 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले अजरबैजान में स्कूल यूनिफॉर्म को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। देश की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था के तहत सरकारी स्कूलों में निर्धारित ड्रेस कोड लागू किए जाने के बाद हिजाब पहनकर स्कूल आने वाली छात्राओं को कथित तौर पर कक्षाओं में प्रवेश से रोका जा रहा है। इस मुद्दे ने धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षा के अधिकार और सरकार के धर्मनिरपेक्ष नियमों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

विवाद के बीच कई छात्राओं और उनके समर्थकों ने विरोध दर्ज कराया है। कुछ स्थानों पर विद्यार्थियों ने कक्षाओं का बहिष्कार कर दिया। वहीं, अधिकारियों के मुताबिक, स्कूल यूनिफॉर्म संबंधी नियमों के विरोध के दौरान हुई घटनाओं के सिलसिले में 37 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हालांकि, सरकार के आदेश में हिजाब पर सीधे प्रतिबंध लगाने की बात नहीं कही गई है। विवाद इस बात को लेकर है कि स्कूलों में निर्धारित ड्रेस कोड को लागू करने के दौरान हिजाब पहनने वाली छात्राओं के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है।

अजरबैजान में हिजाब विवाद क्यों बढ़ा?

अजरबैजान की सरकार ने सरकारी सामान्य शिक्षा संस्थानों में एक समान स्कूल यूनिफॉर्म लागू करने के उद्देश्य से नए नियमों को मंजूरी दी। इन नियमों का उद्देश्य देश की धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप ड्रेस कोड निर्धारित करना बताया गया है।

नियमों में हिजाब का स्पष्ट उल्लेख नहीं होने के बावजूद कई स्कूलों में इसे लेकर सख्ती किए जाने की खबरें सामने आईं। हिजाब पहनकर पहुंचने वाली छात्राओं को कथित तौर पर स्कूल परिसर या कक्षाओं में प्रवेश नहीं दिया गया। इसके बाद मामला केवल स्कूल यूनिफॉर्म तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से भी जुड़ गया।

प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों का कहना है कि हिजाब पहनना उनकी धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत पसंद का हिस्सा है। उनका तर्क है कि सिर ढकने वाला कपड़ा शिक्षा प्राप्त करने में बाधा नहीं बनना चाहिए। दूसरी ओर, स्कूलों में निर्धारित यूनिफॉर्म लागू करने के पक्ष में धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था और समान ड्रेस कोड का हवाला दिया जा रहा है।

स्कूल यूनिफॉर्म के नियमों में क्या है प्रावधान?

अजरबैजान में सरकारी स्कूलों की यूनिफॉर्म को लेकर 21 सितंबर को कैबिनेट स्तर पर प्रस्ताव पारित किए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसका उद्देश्य सरकारी सामान्य शिक्षा संस्थानों में एक समान ड्रेस कोड लागू करना बताया गया।

प्रावधानों के तहत निर्धारित यूनिफॉर्म से अलग अतिरिक्त कपड़े पहनने को लेकर नियम बनाए गए हैं। कुछ विशेष कपड़ों की अनुमति के लिए संबंधित शैक्षणिक निकाय की मंजूरी का प्रावधान भी बताया गया है। इन नियमों के तहत राष्ट्रीय इतिहास, संस्कृति और नैतिक मूल्यों को दर्शाने वाले परिधानों को लेकर भी व्यवस्था निर्धारित की गई है।

हालांकि, आदेश में हिजाब पर सीधे प्रतिबंध का उल्लेख नहीं होने के कारण इसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। विवाद का प्रमुख कारण यही है कि सामान्य ड्रेस कोड के नियमों को कुछ स्कूलों में हिजाब पहनने वाली छात्राओं पर किस तरह लागू किया जा रहा है।

शिक्षकों के ड्रेस कोड को लेकर भी उठे सवाल

स्कूलों में यूनिफॉर्म संबंधी विवाद के बीच शिक्षकों के पहनावे को लेकर भी चर्चा तेज हुई है। 6 अक्टूबर को शिक्षकों के ड्रेस कोड से जुड़े नियमों को मंजूरी दिए जाने की जानकारी सामने आई थी।

इसके बाद हिजाब पहनने वाली महिला शिक्षकों पर भी सिर ढकने वाला कपड़ा हटाने का दबाव बनाए जाने के आरोप सामने आए। कुछ शिक्षकों ने इसे अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय बताया है।

इस घटनाक्रम ने बहस को और व्यापक बना दिया है। अब सवाल केवल छात्राओं की यूनिफॉर्म का नहीं, बल्कि शिक्षण संस्थानों में कर्मचारियों की व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता का भी है।

छात्राओं का विरोध, सोशल मीडिया पर चर्चा तेज

नियमों के लागू होने के बाद कुछ स्कूलों में हिजाब पहनने वाली छात्राओं को वापस भेजे जाने की खबरें सामने आईं। सोशल मीडिया पर ऐसे दृश्य भी चर्चा में आए, जिनमें छात्राएं इस स्थिति को लेकर भावुक दिखाई दीं।

राजधानी बाकू और मसल्ली जिले के एक स्कूल में विद्यार्थियों की ओर से कक्षाओं का बहिष्कार किए जाने की भी खबरें सामने आईं। विरोध करने वाले विद्यार्थियों ने यह संदेश देने की कोशिश की कि धार्मिक पहचान और शिक्षा को एक-दूसरे के विरोध में नहीं रखा जाना चाहिए।

हालांकि, अलग-अलग स्कूलों में नियमों के क्रियान्वयन की स्थिति एक जैसी है या नहीं, इसे समझने के लिए संबंधित घटनाओं और आधिकारिक निर्देशों का अलग-अलग आकलन जरूरी है।

37 लोगों की गिरफ्तारी से बढ़ा मामला

अजरबैजान के गृह मंत्रालय की ओर से 12 अक्टूबर को दी गई जानकारी के अनुसार, स्कूल यूनिफॉर्म संबंधी नियमों के क्रियान्वयन के दौरान हुई घटनाओं के सिलसिले में 37 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

अधिकारियों का आरोप है कि कुछ लोगों ने शिक्षा कर्मचारियों के साथ टकराव किया, शैक्षणिक संस्थानों को नुकसान पहुंचाया और स्कूलों तथा यातायात के सामान्य संचालन में बाधा डाली। इन घटनाओं के बाद विवाद ने कानून-व्यवस्था का रूप भी ले लिया।

हालांकि, गिरफ्तारी की कार्रवाई और हिजाब पहनने के अधिकार को लेकर उठाए जा रहे सवाल अलग-अलग पहलू हैं। पूरे मामले को समझने के लिए विरोध प्रदर्शनों के कारणों और अधिकारियों की ओर से बताए गए आरोपों के बीच अंतर करना जरूरी है।

96% मुस्लिम आबादी, फिर भी धर्मनिरपेक्ष देश है अजरबैजान

अजरबैजान की आबादी का बड़ा हिस्सा इस्लाम को मानता है। देश में शिया मुसलमान बहुसंख्यक हैं, जबकि सुन्नी मुस्लिम समुदाय भी मौजूद है। इसके बावजूद अजरबैजान का संवैधानिक ढांचा धर्म और राज्य को अलग रखने के सिद्धांत पर आधारित है।

देश के संविधान का अनुच्छेद 7 अजरबैजान को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में परिभाषित करता है। वहीं, अनुच्छेद 18 धर्म और राज्य के अलगाव तथा शिक्षा व्यवस्था के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से संबंधित है। संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की भी गारंटी देता है।

यही वजह है कि मौजूदा विवाद में दोनों पक्ष संवैधानिक व्यवस्था के अलग-अलग पहलुओं पर जोर दे रहे हैं। एक तरफ धर्मनिरपेक्ष शिक्षा और समान यूनिफॉर्म की दलील है, तो दूसरी तरफ धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षा तक समान पहुंच का सवाल है।

यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि स्कूल ड्रेस कोड को लेकर उठे विवाद का अर्थ यह नहीं है कि अजरबैजान में आम नागरिकों के हिजाब पहनने पर देशव्यापी प्रतिबंध लगा दिया गया है। फिलहाल विवाद का केंद्र शैक्षणिक संस्थानों में निर्धारित ड्रेस कोड और उसके क्रियान्वयन का तरीका है।

अजरबैजान में पहले भी हो चुका है हिजाब पर विवाद

अजरबैजान में स्कूलों में हिजाब पहनने को लेकर यह पहला विवाद नहीं है। दिसंबर 2010 में भी स्कूल यूनिफॉर्म के नियमों के आधार पर हिजाब पर रोक लगाने की कोशिश के बाद विरोध प्रदर्शन हुए थे।

उस समय भी धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था के बीच संतुलन को लेकर सवाल उठे थे। मौजूदा घटनाक्रम ने एक बार फिर उसी बहस को चर्चा में ला दिया है।

हिजाब विवाद ने खड़े किए कई बड़े सवाल

अजरबैजान में स्कूल यूनिफॉर्म को लेकर शुरू हुआ विवाद अब धार्मिक स्वतंत्रता, शिक्षा के अधिकार और सरकार की नीतियों के बीच संतुलन की परीक्षा बन गया है। क्या समान ड्रेस कोड लागू करने के लिए धार्मिक पहनावे पर रोक लगाना जरूरी है? क्या हिजाब पहनने वाली छात्राओं को भी दूसरे विद्यार्थियों की तरह शिक्षा प्राप्त करने का समान अवसर मिलना चाहिए? और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाएं किस तरह तय की जानी चाहिए?

इन सवालों का जवाब केवल नियमों के शब्दों से नहीं, बल्कि उनके निष्पक्ष और समान क्रियान्वयन से भी जुड़ा है। अजरबैजान में आगे यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि स्कूल प्रशासन, सरकार और संबंधित संस्थाएं ड्रेस कोड को लागू करते हुए धार्मिक स्वतंत्रता तथा शिक्षा के अधिकार के बीच संतुलन कैसे स्थापित करती हैं।

 

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