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जौनसारी ST प्रमाणपत्र की पात्रता पर सवाल, 1967 की अधिसूचना से लेकर हाईकोर्ट तक उठे मुद्दे

देहरादून। उत्तराखंड के जौनसार-बावर क्षेत्र में जौनसारी अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया को लेकर संवैधानिक और कानूनी सवाल उठ रहे हैं। बहस का मुख्य मुद्दा यह है कि क्या जौनसार-बावर क्षेत्र में निवास करना अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र पाने के लिए पर्याप्त है या इसके लिए संविधान के तहत अधिसूचित ‘जौनसारी’ समुदाय का सदस्य होना आवश्यक है।

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अनुसूचित जनजाति का दर्जा संविधान के प्रावधानों और राष्ट्रपति की अधिसूचना के आधार पर निर्धारित होता है। ऐसे में क्षेत्र में रहने और अधिसूचित जनजातीय समुदाय का सदस्य होने के बीच कानूनी अंतर को समझना जरूरी है। प्रमाणपत्र जारी करने के मानदंड, दस्तावेजों की जांच और पात्रता तय करने की प्रक्रिया को लेकर प्रशासन से स्पष्ट जानकारी की मांग भी उठ रही है।

1967 की राष्ट्रपति अधिसूचना में ‘जौनसारी’ समुदाय का उल्लेख

संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत राष्ट्रपति किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के संबंध में अनुसूचित जनजातियों को अधिसूचित करते हैं। वहीं, अनुच्छेद 366(25) में अनुसूचित जनजाति की परिभाषा को अनुच्छेद 342 के तहत अधिसूचित समुदायों से जोड़ा गया है।

24 जून 1967 के संविधान (अनुसूचित जनजाति) उत्तर प्रदेश आदेश में भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, राजी और थारू समुदायों को अनुसूचित जनजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया था। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद भी ये समुदाय राज्य की अनुसूचित जनजाति सूची में शामिल रहे हैं।

इस अधिसूचना के संदर्भ में मुख्य सवाल यह है कि ‘जौनसारी’ समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में अधिसूचित किया गया है या जौनसार-बावर क्षेत्र के प्रत्येक निवासी को केवल क्षेत्र में रहने के आधार पर यह दर्जा प्राप्त हो जाता है।

इन दोनों स्थितियों के कानूनी अर्थ अलग-अलग हैं। इसलिए प्रमाणपत्र जारी करते समय लागू अधिसूचना, सरकारी नियमों और संबंधित व्यक्ति की पात्रता के आधार को स्पष्ट करना आवश्यक है।

जौनसारी ST प्रमाणपत्र पर हाईकोर्ट में भी उठा था सवाल

जौनसारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों की पात्रता से संबंधित मुद्दा उत्तराखंड हाईकोर्ट में भी उठ चुका है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 2 मई 2025 को इटिका पांडे एवं अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में न्यायालय ने राज्य सरकार से इस विषय पर स्पष्टीकरण मांगा था।

मामले में यह सवाल सामने आया कि क्या केवल जौनसार क्षेत्र में निवास करने के आधार पर किसी व्यक्ति को अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी किया जा सकता है।

राज्य सरकार की ओर से यह पक्ष रखे जाने का उल्लेख है कि ‘जौनसारी’ एक अधिसूचित जनजातीय समुदाय है और केवल क्षेत्र में निवास करने से कोई व्यक्ति स्वतः उस समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने प्रमाणपत्र जारी करने के मानदंडों और निवास के आधार पर जारी प्रमाणपत्रों से संबंधित जानकारी पर भी स्पष्टीकरण मांगा था।

हालांकि, इस मामले में न्यायालय के अंतिम निष्कर्ष के संबंध में कोई दावा करने से पहले बाद के आदेशों, राज्य सरकार के जवाब और मामले की वर्तमान स्थिति की आधिकारिक पुष्टि जरूरी है।

जौनसारी समुदाय की सदस्यता तय करने के क्या हैं नियम?

प्रमाणपत्र विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि पात्रता अधिसूचित समुदाय की सदस्यता से जुड़ी है, तो उस सदस्यता की पुष्टि किस प्रक्रिया के तहत की जाती है।

इस संबंध में कई सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है। क्या प्रमाणपत्र जारी करने से पहले पुराने राजस्व अभिलेखों की जांच की जाती है? क्या पिता या पूर्वजों के प्रमाणपत्रों को आधार बनाया जाता है? क्या वंशावली, जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल के रिकॉर्ड और अन्य पारिवारिक दस्तावेजों का सत्यापन अनिवार्य है? क्या राजस्व अधिकारियों की जांच रिपोर्ट के आधार पर पात्रता तय की जाती है?

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इन प्रक्रियाओं के लिए वर्तमान में कौन-से शासनादेश और लिखित दिशा-निर्देश लागू हैं।

यदि सरकार ने पात्रता और सत्यापन के स्पष्ट मानक निर्धारित किए हैं, तो उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी और पात्रता को लेकर पैदा होने वाले विवादों को भी कम करने में मदद मिल सकती है।

क्या सामान्य जाति का व्यक्ति जौनसारी ST प्रमाणपत्र ले सकता है?

जौनसार-बावर में यह सवाल भी चर्चा का विषय रहा है कि सामान्य जाति से संबंधित व्यक्ति जौनसारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकता है या नहीं।

इसका निर्णय केवल सामाजिक पहचान, प्रचलित जाति के नाम या किसी व्यक्ति के क्षेत्र में रहने के आधार पर नहीं किया जा सकता। संबंधित व्यक्ति की वास्तविक पात्रता, अधिसूचित समुदाय से उसका संबंध, लागू नियमों और उपलब्ध दस्तावेजों की जांच महत्वपूर्ण होगी।

इसी तरह, किसी व्यक्ति को केवल सामान्य जाति का बताकर उसका दावा खारिज करना भी पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में सक्षम प्राधिकारी को संबंधित कानून, शासनादेश और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेना होगा।

इसलिए जरूरी है कि प्रशासन यह स्पष्ट करे कि जौनसारी ST प्रमाणपत्र जारी करने के लिए कौन-से मानक अपनाए जाते हैं और अलग-अलग मामलों में पात्रता का निर्धारण किस आधार पर होता है।

‘जौनसारी’ नाम की वर्तनी को लेकर भी उठा था विवाद

जौनसारी समुदाय के नाम की वर्तनी को लेकर भी न्यायिक स्तर पर मुद्दा उठने की बात सामने आई है। 19 सितंबर 2025 के WPPIL No. 180 of 2025 में राष्ट्रपति के आदेश में समुदाय के नाम की वर्तनी और उससे प्रमाणपत्रधारकों को नियुक्ति या अन्य लाभ प्राप्त करने में कथित कठिनाइयों का विषय उठाया गया था।

इस मामले में भी दो बातों के बीच अंतर करना जरूरी है। न्यायालय द्वारा किसी मुद्दे पर विचार करना या संबंधित पक्षों से जवाब मांगना और राष्ट्रपति की अधिसूचना में औपचारिक संशोधन होना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

इसलिए ‘जौनसारी’, ‘जन्नसारी’ या ‘जौनासारी’ जैसी वर्तनी से जुड़े विवाद की वर्तमान स्थिति स्पष्ट करने के लिए आधिकारिक अधिसूचना, उसके बाद जारी संशोधनों और न्यायालय के नवीनतम आदेशों की प्रमाणित प्रतियां देखना आवश्यक है।

गलत ST प्रमाणपत्रों की जांच में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश अहम

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों की जांच के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का कुमारी माधुरी पाटिल बनाम अतिरिक्त आयुक्त मामला महत्वपूर्ण माना जाता है। इस फैसले में न्यायालय ने सामाजिक स्थिति से संबंधित प्रमाणपत्रों की जांच और गलत प्रमाणपत्रों के आधार पर संवैधानिक लाभ प्राप्त करने की समस्या पर जोर दिया था।

हालांकि, इस फैसले को जौनसारी समुदाय की सदस्यता की अलग परिभाषा तय करने वाला निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। इसका महत्व प्रमाणपत्रों के सत्यापन और जांच की विश्वसनीय प्रक्रिया के संदर्भ में है।

जौनसारी ST प्रमाणपत्रों के मामले में लागू होने वाले सटीक नियमों और जांच प्रक्रिया को समझने के लिए संबंधित राज्य के शासनादेशों, अधिसूचनाओं और न्यायिक आदेशों का भी अध्ययन जरूरी है।

प्रशासन से इन सवालों के जवाब की मांग

जौनसार-बावर में अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी करने की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए प्रशासन से आंकड़ों और दस्तावेजों के आधार पर जानकारी सार्वजनिक करने की मांग महत्वपूर्ण है।

प्रमुख सवाल हैं:

  • अब तक कितने जौनसारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं?
  • कितने आवेदन अस्वीकार किए गए और कितने प्रमाणपत्र निरस्त हुए?
  • प्रमाणपत्रों के सत्यापन के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाती है?
  • क्या केवल क्षेत्र में निवास के आधार पर प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं?
  • जौनसारी समुदाय की सदस्यता प्रमाणित करने के लिए कौन-सा शासनादेश लागू है?
  • क्या वंशावली और पुराने राजस्व अभिलेखों की जांच अनिवार्य है?
  • इटिका पांडे एवं अन्य बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में हाईकोर्ट के सवालों पर सरकार ने क्या जवाब दिया?
  • वर्ष 2025 में उठे वर्तनी विवाद पर संबंधित प्राधिकारियों ने क्या कार्रवाई की?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने से प्रमाणपत्र व्यवस्था की वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। साथ ही, पात्र लोगों के अधिकारों की रक्षा और गलत प्रमाणपत्रों की आशंका से जुड़े मामलों में भी स्पष्टता आएगी।

क्षेत्रीय पहचान और संवैधानिक पात्रता के बीच स्पष्टता जरूरी

जौनसार-बावर अपनी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और जनजातीय इतिहास के लिए जाना जाता है। लेकिन किसी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान और संविधान के तहत अधिसूचित अनुसूचित जनजाति का सदस्य होने की व्यक्तिगत पात्रता को एक ही अवधारणा मानकर नहीं चला जा सकता।

जौनसारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्रों से जुड़े सवालों का समाधान भावनाओं या सामाजिक धारणाओं के बजाय राष्ट्रपति की अधिसूचना, लागू शासनादेशों, प्रमाणपत्र सत्यापन की प्रक्रिया और न्यायालय के नवीनतम आदेशों के आधार पर होना चाहिए।

अब जरूरत इस बात की है कि राज्य सरकार और संबंधित प्रशासन प्रमाणपत्र जारी करने के मानदंड, पात्रता तय करने की प्रक्रिया और न्यायालय में उठाए गए सवालों की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करें।

आखिर जौनसारी ST प्रमाणपत्र की पात्रता का आधार क्या है—अधिसूचित समुदाय की सदस्यता या केवल जौनसार-बावर क्षेत्र में निवास? इस सवाल का स्पष्ट और दस्तावेजों पर आधारित जवाब ही विवाद को समझने और प्रमाणपत्र व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है।

रिपोर्ट: नीरज उत्तराखंडी

 

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