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गंभीर बीमारी, फिर ट्रांसफर और मौत… गिरधर सिंह बिष्ट मामले में हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब

नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने चिकित्सा स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रहे स्वर्गीय गिरधर सिंह बिष्ट की मौत से जुड़े मामले में राज्य सरकार और महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को नोटिस जारी किया है। अदालत ने मामले में जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश गिरधर सिंह बिष्ट के भाई कुलदीप सिंह बिष्ट की ओर से दायर रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे गिरधर सिंह बिष्ट के स्थानांतरण को लेकर अधिकारियों ने संवेदनशीलता नहीं दिखाई और हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों का भी पालन नहीं किया। याचिकाकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराकर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।

याचिका के मुताबिक, गिरधर सिंह बिष्ट ने उत्तराखंड स्थानांतरण अधिनियम, 2017 की धारा 3(डी) के तहत गंभीर बीमारी का हवाला देते हुए स्थानांतरण से राहत की मांग की थी। इस दौरान राज्य मेडिकल बोर्ड की ओर से जारी किए गए चिकित्सा प्रमाण पत्र को भी चुनौती दी गई थी। मामले पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 19 फरवरी 2026 को अधिकारियों को निर्देश दिया था कि गिरधर सिंह के मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित होने के दो दिन के भीतर उनकी दोबारा स्वास्थ्य जांच कराई जाए।

याचिकाकर्ता का कहना है कि गिरधर सिंह 28 फरवरी 2026 को मेडिकल बोर्ड के समक्ष उपस्थित हुए, लेकिन इसके बावजूद नया स्पष्ट चिकित्सा प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया। इसके बाद 16 अप्रैल 2026 को मेडिकल बोर्ड की ओर से फिर एक कथित रूप से अस्पष्ट प्रमाण पत्र जारी किया गया, जिसकी प्रति भी गिरधर सिंह को उपलब्ध नहीं कराई गई।

मामले में आरोप है कि हाईकोर्ट के निर्देशों के बावजूद 5 मई 2026 को गिरधर सिंह का दोबारा स्थानांतरण कर दिया गया। याचिका में कहा गया है कि स्थानांतरण और स्वास्थ्य संबंधी घटनाक्रम के बीच उन्हें मानसिक और शारीरिक तनाव का सामना करना पड़ा, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ती चली गई और वह कोमा में चले गए। बाद में उनका निधन हो गया।

गिरधर सिंह बिष्ट के निधन के बाद उनके भाई कुलदीप सिंह बिष्ट ने सूचना का अधिकार (RTI) के माध्यम से मेडिकल बोर्ड से संबंधित दस्तावेज और प्रमाण पत्र हासिल किए। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर पूरे प्रकरण की जांच की मांग की।

याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया है कि यदि संबंधित अधिकारियों ने हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए मामले को गंभीरता और संवेदनशीलता से लिया होता तो परिस्थितियां अलग हो सकती थीं। हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित विभाग और अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है।

हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार और महानिदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। अब मामले में सरकार और विभाग की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब के बाद आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।

 

 

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