कौन हैं ज्ञानेश कुमार? CEC बनते ही क्यों रहे विपक्ष के निशाने पर

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर एक बार फिर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। चुनाव आयोग में फैसलों को लेकर कथित तौर पर मतभेद की खबरों के बाद विपक्ष ने उनके खिलाफ महाभियोग की मांग को लेकर अपना रुख और मुखर कर दिया है। हालांकि, चुनाव आयोग ने इन खबरों पर स्पष्ट किया है कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय और सुझाव सामने आना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग के मुताबिक, पिछले एक साल में लिए गए सभी अंतिम फैसले, जिनमें स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े फैसले भी शामिल हैं, सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

ज्ञानेश कुमार फरवरी 2025 में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बने थे। इससे पहले वह चुनाव आयुक्त के तौर पर भी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनके प्रशासनिक करियर में केंद्रीय गृह मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय में महत्वपूर्ण पदों पर काम करने का अनुभव रहा है।

कौन हैं ज्ञानेश कुमार?

ज्ञानेश कुमार 1988 बैच के केरल कैडर के आईएएस अधिकारी हैं। उन्होंने आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक की पढ़ाई की है। इसके अलावा उन्होंने बिजनेस फाइनेंस की भी पढ़ाई की है।

31 जनवरी 2024 को वह केंद्रीय सहकारिता सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। इससे पहले मई 2022 से वह सहकारिता मंत्रालय में सचिव के पद पर कार्यरत रहे। यह मंत्रालय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अधीन है।

मार्च 2024 में ज्ञानेश कुमार को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया। उन्होंने 15 मार्च 2024 को पदभार संभाला। इसके बाद फरवरी 2025 में उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी दी गई।

गृह मंत्रालय में भी निभाई अहम जिम्मेदारी

ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक करियर काफी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से जुड़ा रहा है। उन्होंने करीब पांच वर्षों तक केंद्रीय गृह मंत्रालय में काम किया। मई 2016 से सितंबर 2018 तक वह संयुक्त सचिव और सितंबर 2018 से अप्रैल 2021 तक अतिरिक्त सचिव रहे।

अतिरिक्त सचिव के कार्यकाल के दौरान वह जम्मू-कश्मीर से जुड़े मामलों को देख रहे थे। अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन से जुड़े फैसले किए थे।

उनकी भूमिका जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन से जुड़े प्रशासनिक कामकाज में भी रही। इसी वजह से मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद उनके प्रशासनिक करियर में अनुच्छेद 370 से जुड़े कार्यों का भी उल्लेख प्रमुखता से किया गया।

राम मंदिर ट्रस्ट के गठन से भी जुड़ा रहा नाम

ज्ञानेश कुमार के प्रशासनिक करियर में अयोध्या में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन से जुड़ी जिम्मेदारियों का भी उल्लेख मिलता है। गृह मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने इस प्रक्रिया से जुड़े प्रशासनिक कार्यों में भूमिका निभाई थी।

सहकारिता मंत्रालय में सचिव रहते हुए उनके कार्यकाल में मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटीज से जुड़े कानून में संशोधन भी हुआ। इस बदलाव का उद्देश्य सहकारी क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाना बताया गया था।

चुनाव आयुक्त रहते हुए कई बड़े चुनाव

मार्च 2024 में चुनाव आयुक्त बनने के बाद ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में लोकसभा चुनाव 2024 आयोजित हुए। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 में बदलाव के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव कराए गए।

उनके चुनाव आयुक्त रहने के दौरान हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र और दिल्ली समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हुए।

फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद चुनाव आयोग की जिम्मेदारियों का दायरा और बढ़ गया। उनका कार्यकाल जनवरी 2029 तक निर्धारित है। इस दौरान कई राज्यों में विधानसभा चुनावों के साथ 2027 के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव तथा 2029 के लोकसभा चुनाव की चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी आयोग के सामने रहेंगी।

चुनाव आयोग में मतभेद की खबरों पर क्या कहा गया?

हाल में चुनाव आयोग के भीतर फैसलों को लेकर कथित मतभेद की खबरें सामने आने के बाद राजनीतिक विवाद बढ़ा। रिपोर्टों में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले कुछ महीनों में आयोग के कुछ फैसलों पर आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

इन खबरों के बाद विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की मांग को लेकर आवाज तेज की।

हालांकि चुनाव आयोग ने इन दावों पर अपना पक्ष रखते हुए कहा कि बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय, सुझाव और टिप्पणियां आना सामान्य प्रक्रिया है। आयोग के अनुसार, पिछले एक साल में लिए गए अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं।

ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति पर पहले भी उठे थे सवाल

मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के समय भी विपक्षी दलों ने सवाल उठाए थे। कांग्रेस ने उस समय नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर आपत्ति दर्ज कराई थी।

विवाद का एक प्रमुख मुद्दा मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून में किए गए बदलाव थे।

इस कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए एक समिति का प्रावधान किया गया है। इसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक सदस्य और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 के अपने फैसले में कहा था कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली समिति की व्यवस्था तब तक लागू रहेगी, जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बना देती।

बाद में संसद ने 2023 में नया कानून पारित किया, जिसमें चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह केंद्रीय मंत्रिमंडल के एक सदस्य को शामिल किया गया।

नए कानून के तहत पहली बार नियुक्ति

ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को मार्च 2024 में नए कानून के तहत चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। इसके बाद ज्ञानेश कुमार को फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया।

इस तरह उनकी नियुक्ति चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में हुए कानूनी बदलाव के बाद के महत्वपूर्ण घटनाक्रमों में शामिल रही।

फिलहाल चुनाव आयोग में कथित मतभेद और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विपक्ष की महाभियोग संबंधी मांग ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, नियुक्ति प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज को लेकर बहस को फिर तेज कर दिया है। वहीं आयोग का कहना है कि अलग-अलग राय सामने आना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।

 

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