तेल महंगा, रुपया कमजोर और FII बेकाबू! शेयर बाजार की गिरावट के पीछे ये 4 बड़े कारण

भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। सोमवार को निफ्टी 50 करीब छह महीने के निचले स्तर पर पहुंच गया और 23,000 के स्तर से नीचे बंद हुआ। मंगलवार को भी बाजार में कमजोरी का सिलसिला जारी रहा। सेंसेक्स भी दबाव में रहा। कमजोर रुपया, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक बाजारों में बढ़ती बॉन्ड यील्ड ने भारतीय बाजार की चिंता बढ़ा दी है।

बाजार में मौजूदा गिरावट के पीछे कई घरेलू और वैश्विक कारण एक साथ काम कर रहे हैं। खास तौर पर पश्चिम एशिया में तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत के लिए बड़ी चुनौती बन गई है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है।

महंगा कच्चा तेल बना सबसे बड़ी चिंता

ब्रेंट क्रूड की कीमत 106 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के बाद भारतीय बाजार पर दबाव बढ़ा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है।

महंगे तेल से व्यापार घाटा और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है। साथ ही रुपये की कीमत पर भी असर पड़ सकता है। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होने पर भारत के लिए कच्चे तेल समेत अन्य आयात महंगे हो जाते हैं।

तेल की कीमतों में लगातार तेजी महंगाई को भी प्रभावित कर सकती है। ऐसे माहौल में ब्याज दरों को लेकर जोखिम बढ़ सकता है, जिसका असर कंपनियों की लागत, मुनाफे और शेयरों के मूल्यांकन पर पड़ सकता है।

कमजोर रुपया और विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट

रुपये पर एक बार फिर दबाव बढ़ा है। ऊंची तेल कीमतों और विदेशी पूंजी की निकासी को इसके प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। 18 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में करीब दो साल की सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट दर्ज की गई। रुपये को सहारा देने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा डॉलर की बिक्री भी की गई।

महंगे तेल के कारण तेल आयात के लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ती है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो आयात लागत और महंगाई दोनों पर असर पड़ सकता है।

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने से विदेशी निवेश पर असर

अमेरिकी बाजार में 10 साल की ट्रेजरी यील्ड में तेज बढ़ोतरी भी उभरते बाजारों के लिए चिंता का कारण बनी हुई है। अमेरिकी बॉन्ड की यील्ड बढ़ने पर डॉलर में निवेश वाले फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट निवेशकों के लिए अपेक्षाकृत आकर्षक हो सकते हैं।

ऐसे में भारत जैसे उभरते बाजारों से विदेशी पूंजी निकलने का दबाव बढ़ सकता है। इसका असर रुपये के साथ-साथ भारतीय शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांकों पर भी पड़ सकता है।

बॉन्ड की कीमत और उसकी यील्ड आम तौर पर विपरीत दिशा में चलती हैं। बॉन्ड की कीमत घटने पर यील्ड बढ़ती है और कीमत बढ़ने पर यील्ड घटती है।

वैश्विक शेयर बाजारों में कमजोरी

भारतीय बाजार पर वैश्विक बाजारों की कमजोरी का असर भी दिखाई दे रहा है। एशियाई बाजारों में जापान का निक्केई, दक्षिण कोरिया का कोस्पी और हांगकांग का हैंग सेंग दबाव में रहे। अमेरिकी बाजार में भी कमजोरी का असर एशियाई बाजारों की धारणा पर पड़ा।

वैश्विक स्तर पर ऊंची बॉन्ड यील्ड, पश्चिम एशिया का तनाव, महंगा कच्चा तेल और आर्थिक अनिश्चितता निवेशकों के जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित कर रहे हैं।

विदेशी निवेशकों की बिकवाली से बढ़ा दबाव

सितंबर में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयरों में 20,695 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली की है। दो महीने तक खरीदारी के बाद विदेशी निवेशकों की ओर से फिर बिकवाली देखने को मिल रही है।

आंकड़ों के मुताबिक, कैलेंडर वर्ष 2026 में अब तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में करीब 25.6 अरब डॉलर की बिकवाली कर चुके हैं। इससे बाजार में विदेशी पूंजी के प्रवाह को लेकर चिंता बढ़ी है।

हालांकि, घरेलू निवेशकों की लगातार भागीदारी ने विदेशी बिकवाली के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित किया है। बाजार में घरेलू निवेश का बढ़ता आधार पिछले कुछ वर्षों में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में सामने आया है।

पिछले दो साल से बाजार में क्यों बनी हुई है सुस्ती?

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के चेयरमैन और सह-संस्थापक रामदेव अग्रवाल ने भारतीय शेयर बाजार की मौजूदा स्थिति को लेकर कहा है कि कोविड के बाद भारतीय बाजार में कई वर्षों तक तेज वृद्धि देखने को मिली। उनके अनुसार, 2021 से 2024 के बीच निफ्टी 50 करीब 8,000 से बढ़कर 24,000 के आसपास पहुंच गया था।

उनका कहना है कि तेज बढ़त के बाद बाजार में करेक्शन या कुछ समय तक सीमित दायरे में कारोबार होना स्वाभाविक है। उनके मुताबिक, पिछले कुछ समय में निफ्टी 50 करीब 22,000 से 26,000 के दायरे में रहा है और पीई मल्टीपल भी लगभग 25 से घटकर करीब 20 पर आया है।

रामदेव अग्रवाल के अनुसार, भारतीय कंपनियों की कमाई में लंबे समय के आंकड़ों के आधार पर करीब 12 फीसदी की चक्रवृद्धि वृद्धि देखने को मिली है। उनका अनुमान है कि अगर यह वृद्धि दर बनी रहती है तो इंडेक्स को दोगुना होने में लगभग छह साल लग सकते हैं। वहीं, आर्थिक गतिविधियों में सुधार होने पर 15 फीसदी की वृद्धि दर की स्थिति में यह अवधि करीब पांच साल हो सकती है।

यह एक बाजार विशेषज्ञ का आकलन है और वास्तविक बाजार रिटर्न इससे अलग हो सकते हैं।

आगे बाजार की राह किन बातों पर निर्भर करेगी?

आने वाले समय में भारतीय शेयर बाजार की दिशा कई महत्वपूर्ण कारकों पर निर्भर करेगी। इनमें कच्चे तेल की कीमतें, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक स्थिति, रुपये की चाल, विदेशी निवेशकों की गतिविधियां, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, महंगाई और घरेलू कंपनियों की कमाई प्रमुख हैं।

अगर तेल की कीमतों में तेजी बनी रहती है और विदेशी पूंजी की निकासी जारी रहती है तो बाजार पर दबाव बना रह सकता है। दूसरी ओर, वैश्विक तनाव कम होने, तेल कीमतों में स्थिरता आने और घरेलू आर्थिक गतिविधियों में सुधार से बाजार की धारणा में बदलाव देखने को मिल सकता है।

फिलहाल निवेशकों की नजर निफ्टी के 23,000 के स्तर के आसपास के कारोबार, रुपये की चाल, कच्चे तेल की कीमतों और विदेशी निवेशकों के अगले कदम पर बनी हुई है।

 

 

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